अंधी भक्ति से बचे..

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अंधी भक्ति से बचे..

हमारी वैदिक संस्कृति में प्रारंभ से ही गुरू को विशेष स्थान दिया गया है। हमारी संस्कृति में प्रत्येक व्यक्ति को अपने लिए गुरू बनाना अनिवार्य बताया गया है। कहते है जिसका गुरू नही होता उसका जीवन निरर्थक है। गुरू ही दुनिया में सच्चाई का रास्ता दिखाने वाला व भगवान की लो जगाने वाला होता है।
क्या आज हम अपना सच्चा गुरू ढूंढ पा रहे है? क्या हम यह जानते है कि सच्चा गुरू कैसा होना चाहिए? सच्चे गुरू की पहचान क्या होती है? नही आज हम सिर्फ भेड़ की चाल चल रहे है। किसी ने हमे बताया वह गुरू बहुत पहुचे हुए है, उनका आश्रम इतना बड़ा हे,उनके इतने अनुयायी है यह सब देख सुनकर ही हम आंख बंद करके उनको गुरू बना लेते है।
इसी तरह आजकल साधु बाबाओ व गुरूओं ने धर्म को रूपये कमाने का धंधा बना लिया है। आज धर्म के नाम पर सभी साधु संतों ने अपनी-अपनी दुकाने खोल रखी है। सभी संतो में प्रतिस्पर्धा लगी हुई है किसके पास सबसे ज्यादा अमीर व राजनैतिक शिष्य है जिनके पास ज्यादा राजनीतिज्ञ शिष्य है वह आज सबसे ज्यादा फेमस बाबा माने जाते है। आजकल के अधिकतर साधु बाबा पूर्णत: भोग-विलास,भ्रष्टाचार,व्यभिचार में लिप्त होकर  अपने धार्मिक भ्रष्ट कार्यो को बढ़ा रहे है।  भोली-भाली जनता भी इन धाॢमक धंधो के बाबाओ को नही पहचान पा रही है। साथ ही वह इन बाबाओं के प्रति अंधी आस्था में लिप्त होते जा रहे है।
हमारे समाज में सभी को कुछ न कुछ परेशानी होती रहती है। इसी दौरान उनको किसी बाबा का या अन्य स्थान को बताया जाता है तो वह आंख बंद करके उन पर विश्वास करने लगते है। व्यक्ति अपनी परेशानी स्वयं न हल कर दुसरो से आशा करता है वह ठीक कर देगा। धूर्त बाबा इसी चीज का फायदा उठाकर उनको ठगना शुरू कर देते है। फिर एक समय ऐसा आता है कि वह अंधे भक्त हो जाते है।
भारतीय संस्कृति में गुरू को अत्यधिक सम्मान दिया गया है। हमारी संस्कृति में भगवान से भी पहले गुरू को पूजा जाता है। ऐसा माना जाता है। गुरू ही भगवान से साक्षात्कार कराने में सक्षम होता है। गुरू ही समाज में फैली बुराइयों से हमें बचाता है।  गुरू ही सही दिशा पर चलने की राह दिखाता है। भारतीय इतिहास में गुरू की भूमिका समाज को सुधार की ओर ले जाने वाले मार्गदर्शक की मानी गई है। हमारी भारतीय संस्कृति में गुरू को भगवान से भी बड़ा दर्जा दिया गया है।
 गुरू गोविंद दोउ खड़े, काके लागू पाय,
बलिहारी गुरू आपने,गोविंद दियों बताय,
अर्थात-
गुरू और भगवान दोनो आकर खड़े हो जाए, तो पहले किसके चरण स्पर्श करे? सचमुच यह यक्ष प्रश्न है। लेकिन गुरू के चरण स्पर्श करना ही श्रेष्ठतर है। क्यों कि वो ही भगवान तक पहुंचने का मार्ग बताते है।
गुरूर ब्रह्मा गुरूर विष्णु गुरूर देवो महेश्वर
गुरूर साक्षात् परम-ब्रहम तस्मे श्री गुरूवे नम:
अर्थात-
गुरूर ब्रह्मा-गुरू सृष्टीकर्ता के समान है।
गुरूर विष्णु-गुरू विष्णु संरक्षक के समान।
गुरूर देवो महेश्वर-गुरू भगवान महेश्वर (विनाशक)के समान है।
गुरू साक्षात-सच्चा गुरू आंखो के समक्ष रहता है।
परब्रह्मा-सर्वोच ब्रह्मा,
तस्मै गुरूवे नम:-उस एक मात्र सच्चे गुरू को में नमन करता हूं।
गु शब्द का अर्थ अंधकार को मिटाने वाला,रु का अर्थ प्रकाश ज्ञान को बढ़ाना व अज्ञानता को नष्ट  करने वाला जो ब्रह्म रुप प्रकाश है।
भारतीय इतिहास में गुरूओं ने समाज की कुरीतियों को समाप्त कर समाज को जाग्रत किया है। आज भी कई गुरूओं ने अपनी अमिट छाप छोड़ रखी है। हमारी स्मृतिपटल पर कुछ नाम आज भी छपे हुए है। जैसे- गुरू घासीदास,स्वामी विवेकानंद व रामकृष्ण परमहंस,चाणक्य आदि।
गुरू घासीदास-गुरू घासीदास जी का जन्म ऐसे समय में हुआ था जब समाज में अत्यंत छुआछूत, ऊंचनीच,झूट-कपट का बोल-बाला था। बाबा ने ऐसे समय में समाज को एकता व भाई-चारे तथा समरसता का संदेश दिया था। बाबा घासीदास की सत्य के प्रति अटुट आस्था थी। गुरू घासीदास जी ने समाज के लोगो को सात्विक जीवन जीने की प्रेरणा दी। उन्होने न सिर्फ सत्य की आराधना की,बल्कि समाज में नई जागृति पैदा की और अपनी तपस्या से प्राप्त ज्ञान और शक्ति का उपयोग मानवता की सेवा के कार्य में किया।
गुरू रामकृष्ण परमहंस-रामकृष्ण परमहंस भारत के महान विचारक थे। इन्होने सभी धर्मो की एकता पर जोर दिया। उन्हे बचपन से ही यह विश्वास था कि ईश्वर के दर्शन हो सकते है। अत:ईश्वर की प्राप्ती के लिए उन्होने कठोर साधना और भक्ति की। स्वामी परमहंस मानवता के पुजारी थे। उनका मानना था संसार के सभी धर्म सच्चे है। उनमें कोई भिन्नता नही है। वे ईश्वर तक पहुंचने के लिए भिन्न -भिन्न साधना किया करते थे। वह हमेशा भक्ति साधना में लगे रहते थे।
स्वामी विवेकानंद-वेदांत के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरू थे। विवेकानन्द पुरोहितवाद,धार्मिक आडम्बरो,रूडिय़ों के सख्त खिलाफ थे। उन्होने धर्म को मनुष्य के सेवा केंद्र में रखकर ही आध्यात्मिक चिंतन किया था। उन्होने तैतिस करोड़ देवी-देवता को नेवेद्य न लगाएं। भगवान की जगह उन गरीबों को भोजन कराएं जो बेबस व मजबूर है।
चाणक्य-यह प्रकांड विद्वान तथा गंभीर चिंतक के रुप में कोटिल्य चतुर व राजनीतिज्ञ भी थे। सादा जीवन व उच्च विचार का सही प्रतीक थे।
लेकिन आजकल के गुरूओ ने अपने शिष्यों का जीवन ही नरक कर दिया है। आजकल शिष्यो को मरने मारने की शिक्षा दे रहे है। उनको कोई नैतिक शिक्षा नही देते। अलबत्ता उन्हे भी अनैतिकता के अंधकार में धकेल रहे है।
ऐसे कई फर्जी गुरू बाबा और संत आज हमारे सामने है,जो समाज में भ्रष्टाचार,व्यभिचार,बलात्कार,हत्या,लोगो को बरगलाना,भूमाफिया जैसे अनैतिक व आपराधिक कार्य कर रहे है।
गुरमीत राम रहीम बाबा-हरियाणा के सिरसा में सच्चा डेरा आश्रम में अय्याशी का डेरा बना रखा था। इस आश्रम में भोग-विलास के सारे महंगे साजो सामान होते थे। आश्रम में ही कई अनुयायी साध्वी के साथ शारीरिक संबंध भी रखा करते थे। अगर वह मना करती तो जबर्दस्ती सम्बन्ध बनाया जाता था। अगर कोई अनुयायी जाने की बात करता तो उसे मरवा दिया जाता। इस पर कई हत्याओं का आरोप भी है। वह दान पुण्य का पेसा अपनी अय्याशी में लगाता। कई किसानो की जमीने हड़प ली। बाबा राम रहीम ने भारत में ही नही विदेशों में भी अपने अय्याशी के लिए करोड़ो के महलनुमा आश्रम बना रखे है। लोगों की आस्था के साथ यह खेलता रहा।
आशाराम बापू-आशाराम बापू ने भी अपनी भोग विलास के लिए अय्याशी अडडा आश्रम में ही बना रखा था। इसने भी करोडो की सम्पत्ति बना रखी थी लोगो से अधिक से अधिक दान पुण्य लेता था। कई लोगो की जमीने हड़प ली गई भक्तो को डरा धमका कर अपना काम करवाता था। इन्होने भी २०१३ में १६ वर्षीय बालिका का योन शोषण किया था।
संत राम पाल-हरियाणा के संत राम पाल पर भी हत्या व अपहरण का केस चल रहा है।
स्वामी नित्यानंद पर भी अपनी अनुयायी के यौन शोषण का केस चल रहा है।
राधे र्मां – यह भी चमकती हुई साध्वी है इन्हे भी बाहरी चमक-दमक व फेशन में राधे मां है। इन पर भी अपने अनुयायी को दहेज मांगने के लिए उकसाने का आरोप है।
स्वामी भीमानंद पर आश्रम में वेश्यालय चलाने के आरोप में बंद है।
बहुत लम्बी सूची है ऐसे धूर्त बाबाओं की जो सीधे साधे लोगो को ठग रहे है। उनकी धार्मिक आस्थाओं के साथ खेल रहे है।
सच्चे गुरू साधु-संत मोह-माया रुपये पेसो से दूर रहते है। उनको दुनिया के ऐशोआराम व भोगविलास की वस्तु से कोई लेना-देना नही होता है। वह अपनी साधना भक्ति में ही लीन होते है। उनको महलनुमा आश्रम व साजोसामान की आवश्यकता नही होती है उनको लोगो के दान के पुण्य की लालसा नही रहती है। उनको दुनियादारी से कोई मतलब नही होता है। ऐसे संत संसारिक दुनिया से दूर रहते है।  ऐसे गुरू व साधु संतो की तलाश हमे करनी चाहिए। जिनसे हमारा आज व कल भी सवर सके। हमे आजकल के ऐसे धूर्त बाबाओ से सावधान रहना चाहिए। हमे अपने विवेक से कार्य लेना चाहिए किसी भी गुरू के प्रति अंधी भक्ति न रखे।

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