बच्चियों को बचाएं माहवारी के तनाव से

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आज महिलाएं हर क्षेत्र में अपना लोहा मनmahavari-1वा चुकी है। कोई भी ऐसा क्षेत्र नही है जहां महिलाओं का हस्तक्षेप न हो। चांद पर जाने से लेकर लडाकू विमान को उड़ाने तक। इसी तरह बिजनेस क्षेत्र में भी कमान संभाल रखी है। खेल क्षेत्र में भी वह पीछे नही है। हाल ही में रियों ओलम्पिक में सिल्वर मेंडल जीतने वाली सिंधु और कांस्य पदक जीतने वाली साक्षी मलिक को कौन नही जानता है। आज महिलाओ ने हर क्षेत्र में अपना वर्चस्व बना रखा है। आज लड़की और लड़को में कोई अंतर नही समझा जाता है। दोनो को समान शिक्षा व रहन-सहन दिया जाता है।


    महिलाएं हमारे देश की आन-बान-शान बन रही है। लेकिन ये कुछ ही परिवारों की कहानी है,जहां लडकियों और लडकों में कोई फर्क नहीं किया जाता। लेकिन आज भी हमारे देश में कई जगह लड़कियों के साथ उन दिनों अमानवीय व्यवहार किया जाता है जब उन्हे सबसे ज्यादा प्यार सहानुभूति की जरूरत होती है।  प्रकृतिनुसार लड़कियों का बचपना खत्म भी नही होता है कि उनको माहवारी शुरू हो जाती है। जो  सामान्य बात है।  जिसके कारण कई लड़किया डर जाती है या सहम जाती है। उनके व्यवहार में अचानक बदलाव शुरू हो जाता है। ऐसे समय उनको सही तरीके से समझाना चाहिए और स्वच्छता के बारे में बताना चाहिए अगर उनको मासिक धर्म दौरान दर्द हो रहा है तो डाक्टर को बताना चाहिए। लेकि न अधिकतर घरों में ऐसा नही होता है। अधिकतर देखा गया है कि हिंदू परिवारों में  मासिक चक्र के दौरान लड़कियों से अछूतो जैसा व्यवहार किया जाता है। जैसे-उन चार दिनो के लिए उनको अलग बिस्तर,अलग खाना, किसी को हाथ नही लगाना,पुरूषों से बात नही करना,भाईयों से दूर रहना,किसी के साथ खेलना नही, रसोई घर में नही जाना। स्कुल नही जाना। ऐसी मान्यता है,कि इन दिनो अशुद्धि होती है। इसलिए अलग रखा जाता है। ये तो लड़कियो के साथ की बात है। इसी तरह महिलाओं को भी अलग कमरे में रखा जाता है। क्यों कि वह अशुद्ध मानी जाती है। कई जगह तो ऐसा व्यवहार किया जाता है कि जैसे उन्होने नारी जाति में जन्म लेकर कोई पाप कर दिया हो।
माहवारी के दिनों में अगर संयुक्त परिवार है तो फिर भी ठीक है। मेनेज हो जाता है। एकल परिवार को ज्यादा परेशानी हो जाती है। पति को ही घर का काम और ऑफिस दोनो कार्य करना होता है। बच्चों को तैयार करना स्कूल छोडना आदि काम । इसी तरह मेरी एक सहेली ने बताया कि जब वह १२ साल की थी उसके पापा उसेे अपने हाथो से खाना खिलाते, पढाते, गेम्स खेलते थे, लेकिन जैसे ही उसका मासिक धर्म शुरू हुआ तो  मां और पिताजी का स्वभाव ही बदल गया। उसे एक चटाई और चादर दे दी गई अलग कमरा दिया गया सोने के लिए। कोई उसे हाथ तक नही लगाता। उसे खाना पानी अलग दे दिया जाता था। वह पानी के मटके को हाथ नही लगा सकती थी।, खाना लेने किचन में गई तो डंाट पड़ी वह समझ नही पा रही थी उसके साथ ये क्या हो रहा है? उसने  मां से पूछा तो उन्होने भी अच्छी तरह से नही बताया। बस यही कहती थी कि तुम अशुद्ध हो अभी चार दिन बाद शुद्ध हो जाओगी। चौथे दिन वह नहा के निकली तो उसकी मां ने एक गिलास गाय का मूत्र उसके उपर डाल दिया जिसके कारण उसे उल्टी हो गई। यह सब इसलिए किया गया कि वह शुद्ध हो जाए और फिर वापस सब सामान्य चलने लगा। उसने मां से पूछा ऐसा क्यो करते है ? तो वह बोली यह हमारी परंपरा है ।
     क्या हमारी संस्कृति व परम्परा यह सिखाती है? जब हमारी बच्ची डरी सहमी हो, आप उसे और कठोर नियम तौर तरीके सिखाएं। जबकि उसको उस समय प्यार और सहानुभूति की जरुरत होती है। 
        हमारी परम्परा व संस्कृति में महिलाओं को विशेष स्थान व सम्मान दिया गया है। हमारे प्राचीन समय में महिलाओं को अत्यंत कठोर कार्य करने होते थे जैसे कुएं से पानी लाना, चक्की पीसना,खेतों पर काम करना। संयुक्त परिवार होने से घर के सारे काम करना। मासिक चक्र के दौरान काफी कमजोरी आ जाती है। इसी कारण मासिक धर्म को संस्कृति व पुराण से जोडा गया है। ताकि महिलाओं को आराम मिल सके। पुराने नियम  स्वच्छता को ध्यान में रखते हुए भी बनाए गए थे। पहल के समय में आज की तरह हाइजेनिक पेडस वगेरह नही हुआ करते थे। इसलिए स्वच्छता बनाए रखने के लिए माहवारी के दिनों में महिलाओं को सबसे दूर रखे जाने का नियम बनाया गया था। आज के समय में महिलाओं को पुराने जमाने की तरह मेहनत के काम नहीं करने पडते। इसके साथ ही हाइजीनिक पैड्स इत्यादि उपलब्ध है। ऐसी स्थिति में महिलाओं के साथ अछूतों जैसे व्यवहार की आवश्यकता भी नहीं रह गई है।
   मासिक चक्र से जुडी भ्रातियां
मासिक चक्र को लेकर कई बार युवतियों में यह गलत धारणा होती है कि वह गुड़ या अन्य गरम चीजे खाने से मासिक चक्र जल्दी शुरू हो जाता है । या खटाई खाने से पेट की नसे फूल जाएगीं। जबकि विज्ञान कुछ और  ही कहता है।
  ी रोग विशेषज्ञ डॉ.डॉली मेहरा के अनुसार — शरीर में विटामिन सी की कमी से शरीर में आयरन (लौह तत्व) की कमी हो जाती है । आयरन की कमी एनीमिया (रक्तअल्पता) का कारण  बन सकती है । इसलिए मासिक धर्म के दौरान भी नींबू,टमाटर,दही के पदार्थो का सेवन मददगार साबित हो सकता है। कबीट,इमली जैसी चीजे गले में इन्फेंकशन ला सकता है। लेकिन इसे मासिक चक्र से जोडना गलत होगा।

माहवारी से पहले का तनाव (पी.एम.एस.)
अकसर महिलाओं को माहवारी के पहले तनाव या चिड़चिडापन होता है,पेडू में दर्द,थकान,बार-बार पेशाब जाना,कब्ज, पैरो में सूजन लेकिन मासिक धर्म शुरू होने पर ये समस्या दूर हो जाती है। ये सभी लक्षण पी हार्मोंन  के  कारण होते है। जो शरीर में पानी की मात्रा को बढ़ाता है। इसलिए ऐसे समय में पानी ज्यादा से ज्यादा पिएं,और चाय,काफी कम कर दे। नमक की मात्रा कम कर दे।
-मासिक धर्म के दोरान दर्द होने पर आप दर्द निर्वारक दवाईयां ले सकते है।
-इन दिनों ज्यादा से ज्यादा फल व हरी सब्जियां खाना चाहिए।
-ज्यादा से ज्यादा पानी पीना चाहिए।
-कम से कम चाय काफी पीएं।
-रोजमर्रा के कार्य करते रहे जैसे-योगा, टहलना,हल्की-फुल्की,एक्सरसाइज स्कूल,कालेज,ऑफिस जाना।

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उम्र घटी माहवारी की
कुछ सालों पहले तक लडकियों की माहवारी शुरु होने की उम्र १३ वर्ष होती थी,लेकिन वर्तमान समय में खानपान में बढ़ते फास्टफूड के चलन, फसलों व सब्जियों पर रासायनिक खाद बेहद जहरीले कीटनाशकों के प्रयोग के कारण स्थिति बदल चुकी है।  अब ८से ९ साल की लड़कियां भी माहवारी से होने लगी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, गाय भेंसों का अधिकतम दूध निकालने के लिए उन्हें लगाए जा रहे आक्सीटोसिन इंजेक्शन का असर दूध में आने और इसके प्रभाव से अबोध बच्चियों के शरीर में तेजी से हो रहे हार्मोनल बदलाव से बेहद कम उम्र में माहवारी आना शुरू हो गई है।
 

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