प्रकृति से जोड़े बच्चों को…

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prakatiहमारे घर के आंगन में हमने कई तरह के पेड़ पौधे लगा रखे है। ताकि पेड़ो से शुध्द वातावरण बना रहे। हमारी कालोनी के कई लोग पूजा पाठ के लिए आम के पत्त्ते व फूल तोडने आते रहते है। कुछ दिन पहले मेरे घर पर एक महाशय आए और नीम की पत्ती तोड़ते हुए पूछने लगे क्या यह नीम का पेड़ है?  मेरी मां ने हां में जवाब दिया।  मैं अंदर काम कर रही थी। मेंने जैसे ही यह सवाल सुना तो मैं दंग रह गई। मैं सोचने लगी ऐसा कौन व्यक्ति है जिसे नीम के पेड़ की जानकारी नही। मेंने काम छोड़ कर पहले बाहर आकर देखा कौन है? जो नही जानता। बाहर आकर देखा तो बड़े ही सभ्य पढ़े-लिखे महाशय सूट-बूट में  थे। मेंने उनसे पूछा भाईसाब आप कहां से आएं हंै? तो बोलने लगे मैं आपकी ही कालोनी में रहता हूं। मेंने बड़ी नम्रता से पूछा आपको नीम का पेड़ कैसा होता है इसकी जानकारी नही है क्या? वह हंसते हुए बोले मुझे थोड़ा कंफ्युज़न था। मंै सोच में पड़ गई हमारा देश किस ओर जा रहा है। इसी तरह कई मेट्रो सिटी के बच्चों को तो यह भी नहीं पता होता है,कि गेहूं, दाल,चावल,हरी सब्जियां
,फल,फूल कहंा से आते है? उनको तो ऐसा लगता है, वह किसी फेक्ट्री में बन कर माल या दुकानो में आते है। इसी तरह एक बच्चा मुझसे बोला दीदी ऐपल, ओरेंज,बनाना, ट्रोपीकाना कम्पनी से आते है क्या? मैं उसको देखती रह गई। मैने बच्चे से पूछा आपको कैसे पता कि  फल कम्पनी में बनते है। उसने बताया हमारे यहां यही आता है इस पर लिखा है। मुझे हंसी भी आई और आश्चर्य भी हुआ। कई माताएं अपने बच्चो को फल न खिलाते हुए ज्यूस ही पिलाती है। इसलिए उनको फलों की जानकारी भी नही होती है।
प्राचीन समय से ही हमारा समाज प्रकृति से जुड़ा हुआ है। प्रकृति और व्यक्ति हमेशा एक-दूसरे के पूरक रहे है। प्रकृ ति के बिना मनुष्य का जीवित रहना नामुमकिन है। हमारे पूर्वजों का मुख्य व्यवसाय खेती व फलो के बगीचेें ही हुआ करते थे। हमारे पूर्वजों ने  तरह-तरह की औषधियों को ढूंढा व कई लाईलाज बिमारियों को ठीक किया। हमारे ऋ षि चरक ने चरक संहिता लिखी। यह आयुर्वेदिक किताब है। इसमें  लोहा,सोना,चांदी,पारा भस्म जो दवाई के रुप में ली जाती है,यह शारीरिक व मानसिक दोनो के लिए लाभप्रद दवाईयां  है, पेड़-पौधे के  औषधीय गुणों की जानकारी है। हमारे पूर्वज छोटी-मोटी बिमारियों का इलाज स्वयं ही कर लेते थे,उनको मालूम होता था कि कौन से पेड़ या पौधे से ठीक होता है। उन्हे किसी डाक्टर के पास जाने की जरुरत नही होती थी। कहने का तात्पर्य यह है, हमारे पूर्वज इतना कुछ जानते थे। किंतु हमारी जानकारी कुछ भी नही है। किंतु आज की व आने वाली जेनरेशन को तो यह भी नही पता कि फल कहंा से आते है। गेहूं कहां होते है? खेत कैसे होते है? कौन से फल के पेड़ होते है? हरी सब्जियों के पोधे कैसे होते है? जड़ वाली सब्जियां कौनसी होती है? आलू,गाजर,मूली,के पेड़ होते है, पौधे या जड़ होती है। टमाटर कहां होते है?बेलों पर कौनसी सब्जी होती है। तेल कैसे बनता है? तेल किस-किस तिलहन का निकाला जाता है? ऐसे सवाल आज के बच्चों के मन में आते रहते है। किंतु इन सवालों का निवारण करने के लिए उनके माता-पिता के पास समय नही होता है। क्योंकि दोनो ही जॉब करते है। अगर रविवार वाले दिन छुट्टी होती है तो अधिकतर फैमिली डोमिनोज़,पिज्जा हंट,मॉल,वाटरपार्क,केएफसी,या फिल्म देखने चले जाते है। क्योंकि अधिकतर मेट्रो सिटीज़ में यही बने हुए है। खेत,फलों के बगीचे तो दूर-दूर तक नही है।
आज कई खेत मॉल,मल्टी या फिर कालोनी का रुप धारण कर चुके है। जहां कभी खेत लहलहाया करते थे,आज फेक्ट्री बन चुकी है। किसान भी आजकल खेती से मन चुराने लगे है उन्हे भी मेट्रो सिटीज़ का दिखावा भाने लगा है। वह भी उनमें रमते जा रहे है। और पेड़ कटाई तो चल ही रही है। कभी सड़क के चौड़ीकरण के नाम पर बड़े-बड़े पेड़ काटे जा रहे है। कही कालोनी,मॉल या कोई फेक्ट्री बनना है इसलिए काटे जा रहे है। अत्यधिक पेड़ कटाई के कारण आज हर जगह बाढ़ ही बाढ़ आ रही है। गांव के गांव बाढ़ में बह गए। सेकड़ो लोगो के घर  उजड़ रहे है। हजारो लोग बाढ़ में मर रहे है। तो गर्मी में कही सूखा पडऩे के कारण लोग भूखे मर रहे है।
आज हमने इतनी तरक्की कर ली है। हम अपना अस्तित्व ही भूल गए है। हमारे भारतीय परम्परा के अनुसार  पेड़ पोधो को पूजा जाता है। पीपल,वट,बरगद,तुलसी,को पूजा जाता है। आम के पत्ते,व फूलो से पूजा की जाती है। बचपन से ही हमें पेड़,पौधे,नदीयां,पहाड़,सूर्य,धरती,प्रकृति को पूजने शिक्षा दी जाती है। सूर्य को जल चढ़ाना,तुलसी,पीपल वट,बरगद की पूजा करना। नदियों की पूजा करना,गंगा,जमुना,सरस्वती,नर्मदा,शिप्रा सभी नदियां पूजी जाती है। कहते है इनमें स्नान करने से पाप धुल जाते है। इसका मुख्य तात्पर्य यह है। हम नदियों को साफ-सुथरा रखे उनमें कोई गंदगी न डाले। इसी तरह पेड़ पौधो को भी हमारी संस्कृति से जोड़ा है ताकि उनका अच्छी तरह संरक्षण हो सके और लोग इन्हे काटे नही। ज्यादा से ज्यादा पेड़-पौधे लगाए। हमारा और पर्यावरण का समन्वय बना रहै।
आज हमारा देश दिनो-दिनो विकास कर रहा है। आज हम अंतरिक्ष व मंगल,चांद पर जाने की योजनाएं बना बना रहे है। लेकिन धरती का नाश कर रहे है। धरती पर हर तरह का प्रदूषण फैल रहा है। आज वायु,मिट्टी,जल,सूर्य का प्रकाश सभी कुछ प्रदूषित हो रहा है। आज हमारा पर्यावरण अत्यंत दूषित हो गया है। आज हमें पर्यावरण को बचाने की आवश्यकता है। हम बारिश में ज्यादा से ज्यादा पौधे लगाएं। उनकी देख रेख करना हमारा कतव्र्य समझें। तभी हम आने वाली प्राकृतिक आपदाओं से बच सकेंगे। हमारे आने वाली जेनरेशन को ये सवाल न पूछने पड़े कि गेंहू कहां होते है,खेत कैसे होते है,फल कहां से आते है आदि। आजकल के मेट्रो सीटीज़ के बच्चों को स्कूल से खेत,खलिहानो व फलो के बगीचों पर समय समय पर ले जाया करे और उन्हे सबके बारे में बताएं। अगर स्कूल से नही ले जाते है,तो माता-पिता को अवश्य ले जाकर दिखाना व बताना चाहिए।

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