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शादी को मजाक न बनाए

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हमें कई जगह ऐसी पंक्तियां पढऩे व सुनने में आ जाती है ,जैसे- शादी के बाद बीवियां आती है
हीर की तरह ,लगती है खीर की तरह, फिर लगती है तीर की तरह, और आखिर में कर देती है फकीर की तरह,। इसी तरह शादी के पहले चंद्रमुखी शादी के बाद सुरजमुखी और शादी के कुछ साल बाद ज्वालामुखी की तरह हो जाती है। कुछ लोगो ने तो शादी शब्द का फुल फार्म भी बना डाला है जैसे शादी एस-शांति भंग, एच-हिम्मत खत्म, ए-आजादी समाप्त, डी-दिमाग खराब, आई-ईम्तहान शुरू, जिसकी हो गई तो झेलो नही हुई तो जी लो। हाल ही में एक सज्जन ने तो शादी पर निबंध ही लिख दिया। कुछ पंक्ती बताते है, शादी एक खुली जेल है। पति पूंजी लगाता है पत्नी लाभ उठाती है। शादी के बाद पत्नी की सारी चिंताए खत्म हो जाती है,और पति की चिंताए शुरू हो जाती है। यहंा तक कह दिया कि शादी के बाद पृथ्वी ही नरक बन जाती है। ऐसी कई पंक्तियां हमे फेसबुक व यअन्य अखबारों में पढऩे को मिल जाती है। कहने को तो यह हास्य ंपंक्ती है किंतु हमारे निजी जीवन में कितनी वास्तविक है ये सभी लोग जानते है। अक्सर लोग महिलाओं को लेकर टिप्पणी करते रहते है। जो लोग इस तरह की टिप्पण़ी करते है व सुन कर खुश होते है।
शादी जैसे पवित्र बंधन को आजकल लोगो ने मजाक बना दिया है। शादी जीवन जंजाल, दुख,आजादी खत्म आदि-आदि।
जिस लडक़े की शादी नही होती है,तो लडक़ा व मां-बाप जगह-जगह मन्नते रखते है कि शादी हो जाए। शादी हो जाने के बाद पति को पत्नी झेलु दिखने लगती है अर्थात अब तो झेलना ही है। ऐसा क्यों? हमेशा पति ही क्यों ये शब्द बोलता है। पत्नी भी पति को झेलती है। कोई भी इंसान भगवान के घर से पूर्ण होकर नही आता है, सभी में कुछ न कुछ कमिंया होती है,पर दोषी पत्नी ही क्यों बताई जाती है । पति क्यों पब्लिक प्लेस पर पत्नी का मजाक बनाने लगता है?
शादी के बाद से ही पति तो निश्चिंत हो जाता है कि घर संभालने के लिए पत्नी आ गई है। लडक़ी जब शादी होकर आती है तो उसके सपने होते है कि में ससुराल जाकर पति की पसंद मेरी पसंद होगी। पति भी मेरी भावनाओं व इच्छाओं को महत्व देगा। समय-समय पर मुझे घुमाने ले जाएगा। सास-ससुर की सेवा कर उनको हमेशा खुश रखुगीं। किंतु शादी होते ही वह कुछ और ही देखती है। माता-पिता की सेवा छोटी ननद व देवर के नखरे आदि शुरू हो जाते है। मध्यम वर्ग में अधिकतर परिवारों में शादी के बाद ही सारे काम की जवाबदारी नई बहु पर डाल दी जाती है। सुबह उठने के बाद से सास,ससुर की चाय, पति की बेड टी से काम चालु होता है, पति नहाने जाएं तो कपड़े पत्नि ही निकाल कर रखेगी ,नाश्ता,खाना सभी की जिम्मेदारी पत्नी ही उठाएगी। साथ ही पति के आफिसके सारे कागज भी पत्नी ही संभालकर रखेगी। इस तरह घर के काम की जिम्मेदारी पत्नी ही उठाएगी। शादी शब्द को इस तरह भी देखे। शादी-
एस-शांति भंग
एच-हिम्मत खत्म
ए -आजादी समाप्त
डी- दिमाग खराब
आई-ईम्तहान शुरु

शांति भंग-शांति भंग पत्नियों की होती है। लडक़ी १८-२० साल अपने मायके में रहकर ससुराल जाती है। उसका रहन-सहन, खाना-पीना,सभी कुछ अलग रहता है। जब वह ससुराल आती है घर के सभी सदस्य उसको समझाने लगते है कि तुम्हेै ससुराल जैसा रहना होगा। हमारे अनुसार काम करना, हमारी अनुमति के बिना कुछ नही करना। हमारे अनुसार कपड़े पहनना होगे। सलवार सुट नही पहनना,फ्री हैंड साडी नही पहनना मेचिंग बिंदी नही लगाना हिल नही पहनना आदि-आदि। मतलब उसके सपने चूर व शांति भंग।

हिम्मत खत्म– हिम्मत खत्म पत्नी की होती है ,क्योकि शादी के बाद अक्सर महिलाएं अपने खाने पीने पर ध्यान नही दे पाती है। वो अक्सर पहले घर के बड़ो व अन्य. सदस्यों को नाश्ता कराती है व भोजन भी पहले घर के सदस्यों को ही कराती है तत्पश्चात वह स्वयं भोजन करती है साथ ही घर का सारा काम करने के बाद ही वह करती है जिससे वह कमजोर हो जाती है कई बार वह इसी कारण बीमार भी रहने लगती है। जिसके कारण उसकी हिम्मत खत्म होने लगती है

आजादी समाप्त-आजादी समाप्त पति की नही पत्नी की होती है। अगर पत्नी हाउस वाइफ है तो घर की साफ-सफाई,कपड़े धोना,बाजार से सामान,सब्जियां लाना,चाय,नाश्ता,भोजन बनाना व सभी सदस्यों को कराना। मेहमान नवाजी करना आदि। पति कही भी किसी भी जगह आ जा सकता है किंतु पत्नि को सोचना पड़ता है,पुछना पड़ता है, सास-ससुर व पति से,मां बनने के बाद बच्चा छोटा है तो कही आना-जाना नही, बड़ा है तो अभी टेस्ट व परीक्षाएं चल रही है आदि।

दिमाग खराब-दिमाग खराब पति का नही पत्नी का होता है। पति तो सुबह उठकर खा पीकर आफिस चला जाता है। पति को घर की चिंता नही होती है। पत्नियां घर पर रहती है। घरवालों की दिनभर की फरमाइशे, अगर किसी की फरमाईश नही मानी तो नाराजगी चालू और नान स्टाप बोलना चालू। कहने का ये मतलब दिमाग पत्नियों का खराब होता है।

ईम्तहान शुरू-ईम्तहान शुरू तो पत्नी का होता है नया घर,विभिन्न प्रकार के विचार वाले लोग,उन सब के साथ रहना। सबके साथ अपने विचार मिलाना, और उनके साथ सामंजस्य बैठाना,आदि।

पत्नी फकीर नही बनाती है जबकि पति की उन्नति में पूर्ण सहयोग देती है। जब पत्नी घर की पूर्ण जवाबदारी लेती है तभी पति उन्नति कर सकता है घर की चिंता से मुक्त होकर ही वह अपना कारोबार फेला पाता है व नोकरी में तरक्की कर पाता है।

सात फेरे व सात वचन-विवाह एक ऐसा मोका होता है जब दो लोगो के साथ दो परिवारो का भी मिलन होता है। कहते है हिंदू विवाह पद्ती शिव पुराण के शिव विवाह से लि गई है सर्व प्रथम माता पार्वती ने भगवान शिव से वामअंग बैठने के लिए ये सात वचन मनवाए थे। इसके बगैर हिंदू विवाह सम्भव नही, सात फेरो के बाद ही शादी पूर्ण मानी जाती है। शादी के सात फेरो में सात वचन भी लिए जाते है । जो की अत्यंत महत्वपूर्ण होते है। सात फेरे मतलब सात जन्मों का साथ माना गया है। हिंदू विवाह संस्कार के अंर्तगत अग्री को साक्षी मानकर वर-वधू अग्री के चारो ओर घुम कर सात फेरे लेते है । इसे सप्तपदी भी कहा जाता है। इस संस्कार में पति-पत्नी दोनो सुख से जीवन बिताने का प्रण लेते है। हर फेरे का एक वचन होता है जिसे पति-पत्नी जीवन भर साथ निभाने का वादा करते है। यह सात फेरे ही हिंदू विवाह की स्थिरता के मुख्य स्तंभ होते है।
सात फेरो के सात वचन- विवाह के बाद कन्या वर के वाम अंग बेठने से पूर्व उससे सात वचन लेती है। ये सात वचन इस प्रकार है।
१ प्रथम वचन
तीर्थव्रतोद्यापन यज्ञकर्म मया सहैव प्रियवयं कुर्यात,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति वाक्यं प्रथमं कुमारी !!
(यहाँ कन्या वर से कहती है कि यदि आप कभी तीर्थयात्रा को जाओ तो मुझे भी अपने संग लेकर जाना। कोई व्रत-उपवास अथवा अन्य धर्म कार्य आप करें तो आज की भांति ही मुझे अपने वाम भाग में अवश्य स्थान दें। यदि आप इसे स्वीकार करते हैं तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ।)
किसी भी प्रकार के धार्मिक कृ्त्यों की पूर्णता हेतु पति के साथ पत्नि का होना अनिवार्य माना गया है। जिस धर्मानुष्ठान को पति-पत्नि मिल कर करते हैं, वही सुखद फलदायक होता है। पत्नि द्वारा इस वचन के माध्यम से धार्मिक कार्यों में पत्नि की सहभागिता, उसके महत्व को स्पष्ट किया गया है।
द्वितीय वचन
पुज्यौ यथा स्वौ पितरौ ममापि तथेशभक्तो निजकर्म कुर्यात,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं द्वितीयम !!
(कन्या वर से दूसरा वचन मांगती है कि जिस प्रकार आप अपने माता-पिता का सम्मान करते हैं, उसी प्रकार मेरे माता-पिता का भी सम्मान करें तथा कुटुम्ब की मर्यादा के अनुसार धर्मानुष्ठान करते हुए ईश्वर भक्त बने रहें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ।)
यहाँ इस वचन के द्वारा कन्या की दूरदृष्टि का आभास होता है। आज समय और लोगों की सोच कुछ इस प्रकार की हो चुकी है कि अमूमन देखने को मिलता है-गृहस्थ में किसी भी प्रकार के आपसी वाद-विवाद की स्थिति उत्पन होने पर पति अपनी पत्नि के परिवार से या तो सम्बंध कम कर देता है अथवा समाप्त कर देता है। उपरोक्त वचन को ध्यान में रखते हुए वर को अपने ससुराल पक्ष के साथ सदव्यवहार के लिए अवश्य विचार करना चाहिए।
तृतीय वचन
जीवनम अवस्थात्रये मम पालनां कुर्यात,
वामांगंयामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं तृ्तीयं !!
(तीसरे वचन में कन्या कहती है कि आप मुझे ये वचन दें कि आप जीवन की तीनों अवस्थाओं (युवावस्था, प्रौढावस्था, वृद्धावस्था) में मेरा पालन करते रहेंगे, तो ही मैं आपके वामांग में आने को तैयार हूँ।)
चतुर्थ वचन
कुटुम्बसंपालनसर्वकार्य कर्तु प्रतिज्ञां यदि कातं कुर्यात,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं चतुर्थं !!
(कन्या चौथा वचन ये माँगती है कि अब तक आप घर-परिवार की चिन्ता से पूर्णत: मुक्त थे। अब जबकि आप विवाह बंधन में बँधने जा रहे हैं तो भविष्य में परिवार की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति का दायित्व आपके कंधों पर है। यदि आप इस भार को वहन करने की प्रतीज्ञा करें तो ही मैं आपके वामांग में आ सकती हूँ।)
इस वचन में कन्या वर को भविष्य में उसके उतरदायित्वों के प्रति ध्यान आकृ्ष्ट करती है। विवाह पश्चात कुटुम्ब पौषण हेतु पर्याप्त धन की आवश्यकता होती है। अब यदि पति पूरी तरह से धन के विषय में पिता पर ही आश्रित रहे तो ऐसी स्थिति में गृहस्थी भला कैसे चल पाएगी। इसलिए कन्या चाहती है कि पति पूर्ण रूप से आत्मनिर्भर होकर आर्थिक रूप से परिवारिक आवश्यकताओं की पूर्ति में सक्षम हो सके। इस वचन द्वारा यह भी स्पष्ट किया गया है कि पुत्र का विवाह तभी करना चाहिए जब वो अपने पैरों पर खडा हो, पर्याप्त मात्रा में धनार्जन करने लगे।
पंचम वचन
स्वसद्यकार्ये व्यवहारकर्मण्ये व्यये मामापि मन्त्रयेथा,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: पंचमत्र कन्या !!
(इस वचन में कन्या जो कहती है वो आज के परिपेक्ष में अत्यंत महत्व रखता है। वो कहती है कि अपने घर के कार्यों में, विवाहादि, लेन-देन अथवा अन्य किसी हेतु खर्च करते समय यदि आप मेरी भी मन्त्रणा लिया करें तो मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ।)
यह वचन पूरी तरह से पत्नि के अधिकारों को रेखांकित करता है। बहुत से व्यक्ति किसी भी प्रकार के कार्य में पत्नी से सलाह करना आवश्यक नहीं समझते। अब यदि किसी भी कार्य को करने से पूर्व पत्नी से मंत्रणा कर ली जाए तो इससे पत्नी का सम्मान तो बढता ही है, साथ साथ अपने अधिकारों के प्रति संतुष्टि का भी आभास होता है।
षष्ठम वचन:
न मेपमानमं सविधे सखीनां द्यूतं न वा दुव्र्यसनं भंजश्चेत,
वामाम्गमायामि तदा त्वदीयं ब्रवीति कन्या वचनं च षष्ठम !!
(कन्या कहती है कि यदि मैं अपनी सखियों अथवा अन्य स्त्रियों के बीच बैठी हूँ तब आप वहाँ सबके सम्मुख किसी भी कारण से मेरा अपमान नहीं करेंगे। यदि आप जुआ अथवा अन्य किसी भी प्रकार के दुव्र्यसन से अपने आप को दूर रखें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ।)
वर्तमान परिपेक्ष्य में इस वचन में गम्भीर अर्थ समाहित हैं। विवाह पश्चात कुछ पुरुषों का व्यवहार बदलने लगता है। वे जरा जरा सी बात पर सबके सामने पत्नी को डाँट-डपट देते हैं। ऐसे व्यवहार से पत्नी का मन कितना आहत होता होगा। यहाँ पत्नी चाहती है कि बेशक एकांत में पति उसे जैसा चाहे डांटे किन्तु सबके सामने उसके सम्मान की रक्षा की जाए, साथ ही वो किन्हीं दुव्र्यसनों में फँसकर अपने गृ्हस्थ जीवन को नष्ट न कर ले।
सप्तम वचन:
परस्त्रियं मातृसमां समीक्ष्य स्नेहं सदा चेन्मयि कान्त कुर्या,
वामांगमायामि तदा त्वदीयं ब्रूते वच: सप्तममत्र कन्या !!
(अन्तिम वचन के रूप में कन्या ये वर मांगती है कि आप पराई स्त्रियों को माता के समान समझेंगें और पति-पत्नि के आपसी प्रेम के मध्य अन्य किसी को भागीदार न बनाएंगें। यदि आप यह वचन मुझे दें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूँ।)
विवाह पश्चात यदि व्यक्ति किसी बाह्य स्त्री के आकर्षण में बँध पग भ्रष्ट हो जाए तो उसकी परिणिति क्या होती है। इसलिए इस वचन के माध्यम से कन्या अपने भविष्य को सुरक्षित रखने का प्रयास करती है।

शादी -शादी बहुत ही पवित्र बंधन माना गया है। पवित्र अग्रि को साक्षी मानकर लिये गए सात फेरे जिंदगी का अहम हिस्सा होता है। जिसमें प्यार,संयम,समझदारी के साथ जिंदगी भर साथ निभाने का वादा किया जाता है

पति-पत्नी का रिश्ता प्यार और विश्वास का होता है। इसे हमेशा बनाएं रखे।
कोई इंसान परफेक्ट नही होता है। एक दूसरे की कमियों को उछाले नही आपस में सुधारने की कोशिश करे।
एक दूसरे की पसंद का विशेष ध्यान रखे। और वही कार्य करे जो आपके साथी को पसंद हो।
आप एक दूसरे को समय जरूर दे। चाहे आप कितने ही व्यस्त क्यों न हो।
अपने साथी से कोई भी बात न छिपाएं । कोई भी निणर्य लेने से पहले आपस में सलाह मशविरा जरूर कर ले।
आपसी तालमेल के दौरान अदब व शिष्टाचार रखे। अपशब्द का इस्तेमाल न करे।
एक-दूसरे का सम्मान करे। यह सम्मान तिसरे की नजर में भी आता है कि आप कितने शिष्टाचारी है।
विवाहित जीवन को भविष्य में सफल बनाने के लिए । हमेशा एक दूसरे के प्रशंसनीय पक्ष पर ध्यान दे।
कहते है- हर सफल व्यक्ति के पीछे किसी औरत का हाथ होता है। छोटे से बड़ा करने में तो मां का होता है किंतु जिंदगी में उन्नति व सफलता पाने के पीछे पत्नी का हाथ होता है।